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रुपये की ऐतिहासिक गिरावट से पंजाब के छात्रों पर बढ़ा आर्थिक बोझ, विदेश में पढ़ाई का सपना हुआ महंगा

जालंधर 

भारतीय रुपये के लगातार कमजोर होने और डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक निचले स्तर (करीब 93 रुपये प्रति डॉलर) तक पहुंच गया है। इसका सीधा असर विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों, खासकर पंजाब के विद्यार्थियों और उनके परिवारों पर पड़ रहा है।  

पहले से ही महंगी विदेशी शिक्षा अब और अधिक बोझिल होती जा रही है, जिससे कई परिवार आर्थिक दबाव में आ गए हैं। रुपये की इस गिरावट ने न केवल कुल शिक्षा बजट को बढ़ाया है, बल्कि सालाना खर्च, लोन की अदायगी और अन्य छिपे हुए शुल्कों के रूप में भी अतिरिक्त बोझ डाल दिया है, जिससे विदेश में पढ़ाई का सपना पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा महंगा हो गया है।

विदेशी मुद्रा का कारोबार करने वाले हेमंत का कहना है कि रुपये में गिरावट के कारण विदेश में पढ़ाई का कुल बजट औसतन 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ गया है। उदाहरण के तौर पर, जो कोर्स पहले लगभग 1.2 करोड़ रुपये में पूरा हो जाता था, अब उसी पर करीब 1.5 करोड़ रुपये तक खर्च आ रहा है। यह वृद्धि केवल मुद्रा विनिमय दर में बदलाव के कारण हुई है, जिससे अभिभावकों की पहले से बनाई गई वित्तीय योजनाएं प्रभावित हो रही हैं और उन्हें अतिरिक्त संसाधन जुटाने पड़ रहे हैं।

डॉलर महंगा होने से छात्रों को हर साल अतिरिक्त राशि चुकानी पड़ रही है। उदाहरण के लिए, 55,000 डॉलर सालाना फीस वाले कोर्स में छात्रों को सिर्फ एक्सचेंज रेट की वजह से करीब 4.11 रुपये लाख अधिक देने पड़ रहे हैं। यह अतिरिक्त खर्च पूरे कोर्स अवधि में लाखों रुपये तक पहुंच जाता है, जो मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए एक बड़ा आर्थिक झटका साबित हो रहा है।

विदेशी एजुकेशन की माहिर परमजीत का कहना है कि मुद्रा विनिमय के दौरान लगने वाले छिपे हुए शुल्क (हिडन चार्जेज) भी छात्रों के लिए बड़ी समस्या बनकर उभरे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, वर्ष 2024 में भारतीय छात्रों को पारदर्शिता की कमी और अतिरिक्त शुल्कों के कारण 1,700 रुपये करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ। इन शुल्कों में बैंक मार्जिन, ट्रांसफर फीस और एक्सचेंज रेट में अंतर जैसी चीजें शामिल हैं, जिनके बारे में अधिकतर छात्रों और अभिभावकों को पहले से स्पष्ट जानकारी नहीं होती।

एजुकेशन लोन पर भी असर
रुपये के कमजोर होने का असर एजुकेशन लोन पर भी पड़ रहा है। लोन की कुल लागत और उसकी अदायगी पर सालाना 3 से 5 प्रतिशत तक अतिरिक्त बोझ बढ़ गया है, जिससे छात्रों के लिए पढ़ाई पूरी करने के बाद कर्ज चुकाना और मुश्किल हो सकता है। ब्याज के साथ-साथ मूलधन की राशि भी बढ़ने से कुल देनदारी पहले के मुकाबले काफी अधिक हो जाती है।

पंजाब से विदेश जाने वाले छात्रों के रुझान में भी हाल के समय में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। वर्ष 2023 में भारत से करीब 3.19 लाख छात्र कनाडा गए थे, जिनमें से लगभग 1.8 लाख यानी करीब 56 प्रतिशत अकेले पंजाब से थे। लेकिन 2024-25 में सख्त नियमों और बढ़ते खर्च के कारण पंजाब से कनाडा जाने वाले छात्रों के आवेदनों में करीब 50 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। यह गिरावट इस बात का संकेत है कि बढ़ती लागत और नीतिगत बदलावों ने छात्रों के फैसलों को सीधे प्रभावित किया है।

अमेरिका के मामले में स्थिति कुछ अलग नजर आती है। 2024-25 शैक्षणिक वर्ष में अमेरिका में लगभग 3.63 लाख भारतीय छात्र नामांकित रहे, जो पिछले वर्ष की तुलना में 10 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। हालांकि, इसके बावजूद 2025 की पहली छमाही में भारतीय छात्रों को जारी किए जाने वाले एफ-1 वीजा में 44 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है, जो भविष्य में वहां जाने वाले छात्रों की संख्या पर असर डाल सकती है।

अमेरिका में पढ़ाई पर चार लाख का अतिरिक्त बोझ
खर्च के स्तर पर देखा जाए तो अमेरिका में पढ़ाई की औसत वार्षिक लागत 25,000 डॉलर से 55,000 डॉलर के बीच है, जिसमें रुपये की गिरावट के कारण 4 लाख तक का सीधा अतिरिक्त बोझ बढ़ गया है। वहीं कनाडा में ग्रेजुएशन की औसत फीस 33,417 और पोस्ट ग्रेजुएशन की 16,321 डॉलर है, जबकि जीआईसी फंड बढ़कर 20,635 कनाडाई डॉलर यानी करीब 13 लाख रुपये हो गया है, जो छात्रों के लिए शुरुआती निवेश को और भारी बना देता है।

विकल्प बदलने लगे छात्र
एजुकेशन एक्सपर्ट पूजा सिंह का कहना है कि “रुपये की गिरावट ने विदेशी शिक्षा को मिडिल क्लास परिवारों की पहुंच से धीरे-धीरे दूर कर दिया है। कई छात्र अब अपने विकल्प बदल रहे हैं या अपनी पढ़ाई को टाल रहे हैं। आने वाले समय में छात्र सस्ते देशों की ओर रुख कर सकते हैं या भारत में ही बेहतर अवसर तलाशेंगे।”

कुल मिलाकर, डॉलर की मजबूती और रुपये की कमजोरी ने पंजाब के छात्रों के विदेशी शिक्षा के सपनों पर गंभीर आर्थिक दबाव डाल दिया है। यदि यही स्थिति बनी रहती है, तो आने वाले समय में विदेश जाने वाले छात्रों की संख्या में और गिरावट देखने को मिल सकती है, और उच्च शिक्षा के लिए वैश्विक विकल्प चुनना पहले से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाएगा। 

 

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